5 राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री पर रोक की मांग, SC ने सुरक्षित रखा आदेश

नई दिल्ली: पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों से पहले इलेक्टोरल बॉन्ड पर रोक लगाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश सुरक्षित रख लिया है. इलेक्टोरल बॉन्ड के खिलाफ 2018 से कानूनी लड़ाई लड़ रहे एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की याचिका में कहा गया है कि इस माध्यम से राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे का स्रोत पता नहीं चलता. कॉरपोरेट कंपनियों से मिलने वाला यह गुप्त दान लोकतंत्र के लिए भी नुकसानदेह है.

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स पहले भी कई मौकों पर इलेक्टोरल बॉन्ड पर रोक लगाने की मांग करता रहा है. लेकिन, सुप्रीम कोर्ट इससे मना कर चुका है. एनजीओ की याचिका विस्तृत सुनवाई के लिए लंबित है. 2019 में इसी याचिका को सुनते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया था कि सभी राजनीतिक दल खुद को इलेक्टोरल बॉन्ड से मिले चंदे की जानकारी सीलबंद लिफाफे में चुनाव आयोग को दें. सुप्रीम कोर्ट के आदेश तक इन लिफाफों को सील ही रखा जाए.

आज एनजीओ की तरफ से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट से कहा कि उनकी याचिका को विस्तृत सुनवाई के लिए नहीं लगाया जा रहा है. हर बार चुनाव से पहले इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री शुरू हो जाती है. इस बार भी पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु समेत पांच राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं और एक अप्रैल से इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री शुरू हो रही है. एक बार फिर राजनीतिक दलों को कारपोरेट कंपनियों से गुप्त चंदा मिलेगा. इसकी जानकारी आम लोगों को नहीं हो पाएगी.

याचिका का विरोध करते हुए एटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा, “यह कहना गलत है कि इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए राजनीतिक दलों को काला धन दिया जाता है. इस तरह का बॉन्ड बैंक से खरीदते समय चेक या ड्राफ्ट से भुगतान किया जाता है. इसलिए, यह पैसा काला धन हो ही नहीं सकता. इलेक्टोरल बॉन्ड के आने के बाद से पार्टियों को इसी के माध्यम से चंदा मिल रहा है. उन्हें नगद चंदा नहीं मिलता.”

वकील प्रशांत भूषण ने एक बार फिर जजों को ध्यान दिलाया कि इलेक्टोरल बॉन्ड को लागू करने का कानून फाइनेंस बिल की तरह संसद में पेश किया गया था. इसकी वैधता पर विचार कोर्ट में लंबित है. लेकिन इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि यह कहना पूरी तरह से सही नहीं है कि दान गुप्त होता है. राजनीतिक दलों को यह पता नहीं चल पाता कि उन्हें चंदा किसने दिया है. सरकार चाहे तो स्टेट बैंक से सत्ताधारी पार्टी को चंदा देने वाले लोगों की जानकारी पा सकती है. इसलिए, या तो इलेक्टोरल बॉन्ड को बंद किया जाए या इसके माध्यम से कौन किसे चंदा दे रहा है, इस जानकारी को पूरी तरह से पारदर्शी कर दिया जाए.

चुनाव आयोग की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि आयोग इलेक्टोरल बॉन्ड का विरोध नहीं करता, लेकिन इसकी पारदर्शिता को लेकर सवाल हैं. चीफ जस्टिस एस ए बोबड़े की अध्यक्षता वाली तीन जजों ने भी इस बात पर सवाल उठाया कि इलेक्टोरल बॉन्ड पर खर्च होने वाले पैसे को टैक्स फ्री क्यों रखा गया है? इस बात को कैसे सुनिश्चित किया जाता है कि राजनीतिक दल को जो चंदा मिला है, उसका उपयोग सिर्फ राजनीतिक कार्य के लिए ही किया जा रहा है? हालांकि, इन सवालों पर विस्तार से सुनवाई नहीं हो सकी. कोर्ट ने विधानसभा चुनाव से पहले इलेक्टोरल बॉन्ड की बिक्री रोक देने के अंतरिम आवेदन पर सभी पक्षों की दलील सुनी और आदेश सुरक्षित रख लिया.

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