हेल्थ पैकेज लाइए सरकार, इकॉनमी दौड़ेगी

लेखक: आनंद प्रधान
देश के बड़े हिस्से में कोरोना महामारी की दूसरी लहर सूनामी में बदल चुकी है। इस सूनामी की बेकाबू लहरों में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की सांसें उखड़ रही हैं। अनेक राज्यों और शहरों में आम लोग अस्पतालों में बेड, ऑक्सिजन, वेंटिलेटर और दवाइयों की भारी कमी तथा कालाबाजारी से जूझ और दम तोड़ रहे हैं। हर ओर लाचारी, हताशा और घबराहट का माहौल है। आम नागरिक एक बार फिर भारतीय राज्य की अव्यवस्था (डिसफंक्शनल चरित्र) और केंद्र/राज्य सरकारों की नाकामियां, आपराधिक लापरवाही तथा नीतिगत भूलों की कीमत चुकाने पर मजबूर हैं।

कहने की जरूरत नहीं है कि इस सूनामी का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। कोरोना की दूसरी लहर ने पहले झटके से उबरने और पटरी पर लौटने की कोशिश कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। देश के अनेक हिस्सों में लॉकडाउन, कर्फ्यू और पाबंदियों के कारण आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं। इससे अर्थव्यवस्था की वी-शेप में रिकवरी की उम्मीदें खत्म होने लगी हैं और वह एक बार फिर बड़ी मुश्किल में फंसती दिख रही है।

आर्थिक सर्वेक्षण की उलटबांसी
यह वित्त मंत्रालय में बैठे भारतीय अर्थव्यवस्था के मैनेजरों के लिए सच का सामना या रियलिटी चेक है। ज्यादा दिन नहीं गुजरे, इस साल जनवरी में वित्त मंत्रालय की आर्थिक नीतिगत सोच के सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज आर्थिक सर्वेक्षण में वे अलग ही उलटबांसी गा रहे थे। इसमें कहा गया था कि स्वास्थ्य संबंधी नीतियां ताजा महामारी को ध्यान में रखकर कतई नहीं बननी चाहिए क्योंकि यह एक तात्कालिक पूर्वाग्रह से प्रेरित होंगी। सर्वेक्षण का तर्क था कि महामारियां सिक्स सिग्मा घटनाएं हैं यानी जिनके निकट भविष्य में होने की आशंका न के बराबर या बहुत कम है।

हालांकि आर्थिक सर्वेक्षण स्वीकार करता है कि कोरोना महामारी ने यह दिखा दिया है कि एक स्वास्थ्य संकट कैसे आर्थिक और सामाजिक संकट में बदल सकता है। लेकिन इससे सबक लेकर स्वास्थ्य व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव लाने, उसे सुलभ, सस्ता और सक्षम बनाने, महामारियों से निपटने पर जोर देने और इसके मुताबिक स्वास्थ्य संबंधी नीतियां बनाने के बजाय आर्थिक सर्वेक्षण उलटी सलाह दे रहा था।

विडंबना देखिए कि कोरोना महामारी की ताजा सूनामी ने इस तर्क और समझ को कुछ ही सप्ताहों में ध्वस्त कर दिया है। इसने बता दिया कि महामारियां सिक्स सिग्मा घटनाएं नहीं रह गई हैं। ज्यादा पीछे न भी जाएं तो पिछले 20 सालों का इतिहास इस बात का सबूत है कि महामारियों की बारंबारता बढ़ रही है। सार्स, मर्स, निपाह, बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू, इबोला, डेंगू, चिकुनगुनिया आदि बीमारियों और महामारियों ने भारत समेत दुनिया के अनेक देशों में लाखों लोगों को अपना शिकार बनाया है। यही नहीं, दुनिया भर के महामारी विशेषज्ञ और वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि कई कारणों खासकर ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, जंगलों की कटाई और भूमंडलीकरण से आने वाले वर्षों में महामारियों की बारंबारता और मारकता बढ़ती जाएगी।

इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था के मैनेजरों को न सिर्फ स्वास्थ्य नीति में बल्कि आर्थिक नीति के भी केंद्र और फोकस में सार्वजनिक स्वास्थ्य खासकर महामारियों से निपटने की तैयारी और उसके लिए जरूरी स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर को प्राथमिकता देनी होगी। आश्चर्य नहीं होगा अगर कुछ दिनों/सप्ताहों में एक बार फिर उद्योग जगत की ओर से सरकार पर उद्योगों और कारोबार को बचाने के लिए आर्थिक-वित्तीय पैकेज की मांग उठने लगे। लेकिन महामारी पर काबू पाए बिना ऐसे किसी पैकेज का खास फायदा नहीं है। इसके बजाय तुरंत एक साहसिक और महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य और सामाजिक पैकेज घोषित करना चाहिए। यह स्वास्थ्य और सामाजिक पैकेज राजकोषीय मद से आना चाहिए और कम से कम 10 लाख करोड़ का होना चाहिए, जो जीडीपी का लगभग 6 से 7 फीसदी होगा।

इस समय देश जिस अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा है, उसमें राजकोषीय घाटे की चिंता नहीं करनी चाहिए। अगर अर्थव्यवस्था पटरी से उतर गई तो राजकोषीय घाटा वैसे भी बेकाबू हो जाएगा। दूसरे, महामारी से निपटने और आम लोगों की जान बचाने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने और उसे सस्ता, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण बनाने के लिए यह रकम कुछ भी नहीं है। सच यह है कि इतनी ही रकम अगले पांच सालों तक हर साल खर्च की जाए तो देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था काफी हद तक ऐसी बड़ी और छोटी महामारियों से लड़ने के काबिल बन पाएगी।

तीसरे, यह स्वास्थ्य पैकेज न सिर्फ आम नागरिकों की जान बचा सकता है बल्कि अर्थव्यवस्था को भी पटरी पर ला सकता है। कोरोना महामारी की दूसरी लहर पिछले आर्थिक-वित्तीय पैकेज की सीमाओं को उजागर कर चुकी है। सबक यह है कि बिना बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य की गारंटी किए अर्थव्यवस्था को भी संभालना संभव नहीं है। स्वास्थ्य पैकेज के जरिये खर्च से अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी क्योंकि देश में हजारों प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, जिला अस्पतालों से लेकर सुपर-स्पेशिएलिटी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों, उच्चस्तरीय शोध केंद्रों, ऑक्सिजन प्लांट, वेंटिलेटर, सार्वजनिक क्षेत्र में वैक्सीन निर्माण इकाइयों के निर्माण, अपग्रेडेशन और विस्तार के साथ-साथ उसमें हजारों डॉक्टरों और लाखों नर्सों/पैरा मेडिकल स्टाफ की भर्ती से अर्थव्यवस्था में मांग को गति मिलेगी।

इस पैकेज का 50 फीसदी हिस्सा इस शर्त के साथ राज्यों को दिया जाना चाहिए कि वे इसे अपने स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर को दुरुस्त करने में खर्च करेंगे। यह इमरजेंसी समझकर और लालफीताशाही को किनारे करके मिशन मोड में होना चाहिए। इसका उद्देश्य देश को स्वास्थ्य संरचना के मामले में आत्मनिर्भर बनाना और कम से कम मध्यम विकसित देशों के स्तर पर लाना होना चाहिए। क्यूबा की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था एक मॉडल हो सकती है।

मुफ्त टीका पहली प्राथमिकता
लेकिन इस स्वास्थ्य पैकेज की पहली प्राथमिकता देश के 90 करोड़ लोगों को जल्दी से जल्दी निःशुल्क टीका लगाना होना चाहिए। इसके लिए खर्च की परवाह नहीं करनी चाहिए। यह केंद्र सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है और इसमें कोई भी हीला-हवाली टीकाकरण कार्यक्रम को पटरी से उतार देगी या सुस्त कर देगी, जिसकी कीमत सबको चुकानी पड़ेगी। याद रहे कि या तो सभी सुरक्षित होंगे या फिर सभी खतरे में रहेंगे।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

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