संस्कृति रक्षण का अनूठा यत्न: 38 साल के यतिन पंडित बांट रहे हैं लुप्त हो रही 14वीं शताब्दी की टांकरी लिपि का ज्ञान, मंत्र-तंत्र के लिए होता था इस्तेमाल

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कुल्लू3 घंटे पहले

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कुल्लू के यतिन पंडित, जो पहाड़ी विरासत से जुड़ी टांकरी लिपि के अलावा कई पहलुओं पर काम कर रहे हैं।

  • जम्मू-कश्मीर की शारदा लिपि की शाखा टांकरी को सहेजने के लिए डिजिटल फॉन्ट किए जा रहे हैं तैयार
  • हिमाचल के अलावा पंजाब, बैंगलुरू और इंग्लैंड में बसे हिमाचल से जुड़े 210 लोग उठा चुके फायदा

(गौरीशंकर). हिमाचल प्रदेश के कुल्लू से संबंध रखने वाले यतिन पंडित लुप्त हो रही टांकरी लिपि का ज्ञान बांट रहे हैं। अब तक हिमाचल के अलावा पंजाब, दिल्ली, इंगलैंड, जर्मनी वगैरह से आकर 210 लोग यतिन से इस लिपि का ज्ञान ले चुके हैं। यतिन को सिर्फ टांकरी लिपि का ज्ञान ही नहीं है, बल्कि वह शारदा लिपि का भी अच्छा ज्ञान रखते हैं। साथ ही भट्‌टाक्षरी, पाबुचि, भोटी लिपियां भी सीख रहे हैं। यतिन पंडित का कहना है कि हिमाचल की यह प्राचीन लिपि लुप्त हो रही है और इस पर काम करने की जरूरत है।

विशेषज्ञों की मानें तो टांकरी लिपि शारदा लिपि की एक शाखा है। इसका प्रचलन पहाड़ी क्षेत्र में 13वीं शताब्दी के आसपास शुरू हुआ था। इसे हिमाचल प्रदेश की पुरानी लिपि माना जाता है। पुराने समय में हिमाचल में अधिकतर लेखन कार्य इसी लिपि में किए जाते थे। आज भी हमारे पहाड़ी क्षेत्रों में पुराने समय के बहुत से शिलालेख इत्यादि टांकरी लिपि में लिखे हुए मौजूद हैं। यतिन पंडित का कहना है कि एक समय में ठाकुरों द्वारा प्रयुक्त लिपि के रूप में प्रसिद्ध हुई। 13वीं और 14वीं शताब्दी में तंत्र-मंत्र और लोक विद्याओं से संबंधित ज्ञान पहाड़ी क्षेत्रों में इसी लिपि में अंकित हुआ। 20वीं सदी के आरंभिक काल तक यह लिपि प्रयोग की जाती रही, लेकिन बाद में धीरे-धीरे प्रचलन से बाहर हो गई। आज इस लिपि को जानने और पढ़ने वाले लोग न के बराबर रह गए हैं।

जम्मू-कश्मीर की शारदा लिपि की शाखा टांकरी की वर्णावली।

यतिन ने कहां से सीखी टांकरी लिपि?
यतिन पंडित का कहना है कि टांकरी लिपि से प्रथम परिचय कुलुई इतिहास के बारे में पढ़ते समय हुआ था। 2018-19 में टांकरी कार्यशाला में भाग लिया। इसमें कांगड़ा से लोक कवि हरिकृष्ण मुरारी टांकरी सिखा रहे थे। उसके बाद स्वर्गीय छेरिंग दोरजे से दैनिक वार्ताओं में इस लिपि से संबंधित बाकी पहलुओं पर चर्चा करने का मौका मिलता रहा। छेरिंग दोरजे ने ही लिपियों के प्रति जिज्ञासा को प्रोत्साहन दिया। इस लिपि को सीखने में हालांकि केवल 5 दिन का समय लगा था, लेकिन इस लिपि के प्रति समझ विकसित करने में बहुत समय लगता है। उनका मानना है कि आज भी टांकरी के लिए पूरी समझ विकसित करने के लिए उन्हें बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।

टांकरी लिपि के बारे में इसी में लिखा गया एक लेख।

लिपि ज्ञान बांटने के लिए लगा चुके हैं कार्यशाला
यतिन पंडित टांकरी लिपि का ज्ञान बांटने के लिए कार्यशाला लगा चुके हैं। इसके लिए ऑनलाइन माध्यम का भी प्रयोग किया गया है। इसके माध्यम से अब तक वे 210 लोगों को शिक्षित कर चुके हैं। हालांकि कुछ कार्यशाला लगाने के लिए भाषा अकादमी ने भी उनका सहयोग किया, लेकिन अधिकतर कार्यशालाएं ऐसी हैं जो यतिन ने अपने स्तर पर ही लगाई हैं। पहली कार्यशाला में 40 लोग शामिल हुए थे। दूसरी कार्यशाला में 80 लोगों ने दिलचस्पी दिखाई थी। तीसरी कार्यशाला में 20 और चौथी कार्यशाला में 30 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया था।

साम्भ संस्था बना चुकी है पहला फॉन्ट
टांकरी लिपि का कम्प्यूटर के लिए पहला फॉन्ट साम्भ संस्था 2016 में तैयार कर चुकी है। उसी को आधार बनाकर अब कम्प्यूटर के लिए टांकरी का दूसरा फॉन्ट भी तैयार किया जा रहा है। इसमें हिमाचाली बोलियों को ध्यान में रखते हुए कुछ विशेष परिवर्तन किए जा रहे हैं। टांकरी लिपि का प्रसार अधिक से अधिक हो उसके लिए एंड्रॉएड प्लेटफॉर्म के लिए भी टांकरी की एप्लिकेशन बनाने का काम जारी है।

अब क्या?
यतिन पंडित का कहना है कि 16 फरवरी 2021 से कला संग्रहालय धर्मशाला द्वारा ऑनलाइन टांकरी कार्यशाला में प्रशिक्षण दिया जाएगा। साथ ही 17 से साम्भ संस्था के साथ मिलकर एक और कार्यशाला शुरू की जा रही है। अभी आने वाली कार्यशालाओं की विशेष बात यह रहेगी कि इसमें टांकरी लिपि के साथ-साथ वह शारदा लिपि का भी बेसिक ज्ञान भी देंगे।

क्यों जरूरी है टांकरी लिपि सीखना?
पंडित का कहना है कि टांकरी लिपि को सीखना जरूरी है, क्योंकि प्रथम तो टांकरी लिपि में पर्वतीय क्षेत्र का बहुत सा इतिहास लिखा गया है। हमारे मंदिर, हमारे रीति-रिवाज़, हमारे देव समाज के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए यह लिपि सीखना बहुत जरूरी है। यह लिपि हमारी विरासत है और विरासत का संरक्षण करना जरूरी है।

Dainic Bhaskar

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