कौन होते हैं अहमदिया मुसलमान? जिसे पाकिस्तान मानता है खतरा


सुषमा स्वराज से जुड़ी बड़ी दिलचस्प कहानी है जिसका जिक्र पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने अपनी पुस्तक में किया है। सुषमा स्वराज चंद्रशेखर से मिलने आईं। उन्होंने चंद्रशेखर से कहा कि मुख्यमंत्री मुझे बर्खास्त करने वाले हैं। मेरा इस्तीफा ले लीजिए, नहीं तो बेइज्जती होगी। चंद्रशेखर ने कहा कि ऐसा कैसे होगा? बिना पूछे वे ऐसा नहीं कर सकते।

जिनके धारदार भाषणों पर सियासत की दुनिया लाजवाब हो जाया करती थी। जिसने बीजेपी में रहते हुए रिश्तों का असंभव सा एक संसार रच डाला था। कौन कहता है कि रिश्तों को काटकर राजनीति बड़ी होती है। सरासर गलत हैं वो लोग। सच तो यह है कि सुषमा स्वराज ने वो राजनीति गढ़ी थी। जिसने करोड़ो अंजान लोगों को अपनी राजनीति का मुरीद बना दिया। 4 दशकों की राजनीति के बीच पहचान कुछ ऐसी बनी थी सुषमा स्वराज की। सुषमा ने अपनी जीवन यात्रा में तमाम ऐसे मुकाम हासिल किए जिन पर देश को हमेशा गर्व रहेगा। सियासी सफर में ऊंचाइों को चढ़ते हुए उन्होंने अपने निजी जीवन को भी बखूबी संजोया। आज हमने सुषमा स्वराज के जीवन, राजनीतिक सफर और कुछ अनसुनी कहानियों का एक विश्लेषण तैयार किया है। जिसे सुनने के बाद आपके मुख से भी निकल पड़ेगा- यूं ही असंभव नहीं लगता सुषमा स्वराज हो जाना। 

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सुषमा स्वराज का जन्म हरियाणा के अंबाला कैंट में 14 फरवरी 1952 को हुआ। सुषमा ने कानून की पढ़ाई करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू कर दी। 1970 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ीं। जुलाई 1975 में स्वराज कौशल से विवाह हुआ। स्वराज कौशल सुप्रीम कोर्ट में सहकर्मी थे। आपातकाल के दौरान जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में हिस्सा लिया। इसी दौरान का एक किस्सा है जब इंदिरा गांधी के घोरतम शत्रुओं का मुकदमा लड़ने और उनका खुलकर साथ देने के लिए सुषमा स्वराज तैयार हो गईं थीं। 

जेल का फाटक टूटेगा, जार्ज हमारा छूटेगा 

जार्ज फर्नांडीस को जेल में डाल दिया गया और आरोप लगाया गया कि आपातकाल के खिलाफ उन्‍होंने सरकारी संस्‍थानों और रेल ट्रैक को उड़ाने के लिए डायनामाइट की तस्‍करी की थी। उनके खिलाफ सरकार को उखाड़ फेंकने को लेकर विद्रोह करने का आरोप लगाया गया 1976 में उन्‍हें गिरफ्तार कर दिल्‍ली की तिहाड़ जेल में बंद किया गया था। सुषमा स्वराज बड़ौदा डायनामाईट केस में जार्ज फर्नांडीस सहित 25 अभियुक्तों की वकील थीं। महज 25 बरस की सुषमा स्वराज इंदिरा गांधी के घोरतम शत्रुओं का मुकदमा लड़ने को तैयार हो गई। 1977 के लोकसभा चुनाव में जार्ज ने जेल से ही नामांकन किया। उनका यहां कोई परिवार या रिश्तेदार नहीं था। उस दौर में जार्ज के चुनावी नैया पार लगाने के लिए सुषमा स्वराज पहुंची। वो बिना किसी ताम-झाम के लगातार नुक्कड़ सभाएं करतीं। यह चुनाव का वह दौर था जब मुजफ्फरपुर के लोगों ने परिवर्तन की लहर देखी। सुषमा सभा में नारा लगाती थीं, जेल का फाटक टूटेगा, जार्ज हमारा छूटेगा। यह नारा आम लोगों की जुबान पर छा गया। पूरे चुनाव के दौरान वह एक बार भी अपने क्षेत्र में नहीं जा सके और उस दौर हाथों में हथकड़ी से जकड़े जार्ज की एक तस्वीर वायरल होती है। देखत ही देखते वो तस्वीर प्रतिरोध का प्रतीक चिन्ह बनकर लोगों के दिलों में उतर गई। नतीजा करीब तीन लाख वोटों से जॉर्ज चुनाव जीत गए। 

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सुषमा से मंत्री पद छीनने पर देवीलाल से बोले चंद्रशेखर- अगर वापस नहीं लोगे तो मुख्यमंत्री नहीं रह पाओगे 

आपातकाल के बाद जनता पार्टी की सदस्य बनीं। 1977 में पहली बार हरियाणा का विधानसभा चुनाव जीता। महज 25 वर्ष की उम्र में राज्य की श्रम मंत्री बनीं और सबसे युवा कैबिनेट मंत्री की उपलब्धि हासिल की। लेकिन हरियाणा के मंत्री रहते हुए भी सुषमा स्वराज से जुड़ी बड़ी दिलचस्प कहानी है जिसका जिक्र पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित अपनी पुस्तक जीवन जैसे जिया में किया है। मोरारजी देसाई की सरकार आने के बाद कांग्रेस शासित राज्यों की विधानसभा भंग हुई। हरियाणा में चुनाव हुए और अंबाला कैंट से सुषमा स्वराज ने चुनाव जीता। चौधरी देवी लाल सीएम बने। सुषमा स्वराज को देवीलाल मंत्री नहीं बनाना चाहते थे। बहाने बना रहे थे। उन्होंने सुषमा जी को कैनिनट मंत्री की शपथ नहीं दिलाई। कहते थे, राज्यमंत्री बन जाओ। एक दिन मधु लिमये के साथ सुषमा स्वराज आईं। उनको भय था कि देवीलाल शपख नहीं दिलाएंगे। चंद्रशेखर ने कहा ऐसा नहीं हो सकता। जनता पार्टी संसदीय बोर्ड का फैसला है। चंद्रशेखर ने देवीलाल से बात की। देवीलाल कहने लगे कि उनसे कहिए, राज्यमंत्री की शपथ ले लें। उन्हें उस पर आपत्ति थी। चंद्रशेखर ने देवीलाल से कहा कि यह संसदीय बोर्ड का फैसला है, जिस पर मैंने दस्तख्त किए हैं। आपको उसका आदर करना चाहिए। चौधरी देवीलाल ने सवालिया अंदाज में कहा कि मंत्री पद की शपथ कैसे दिलवा दें, यह बहुत छोटी है, लेकिन फिर जेपी की इच्छा और चंद्रशेखर के दबाव के चलते न चाहते हुए भी देवीलाल ने सुषमा को श्रम और रोजगार मंत्री बनाया। लेकिन तीन महीने के बाद ही देवीलाल ने सुषमा को निकालने की तैयारी कर ली। 

तीन महीने के बाद वो फिर मधु लिमये के साथ चंद्रशेखर से मिलने आईं। उन्होंने चंद्रशेखर से कहा कि मुख्यमंत्री मुझे बर्खास्त करने वाले हैं। मेरा इस्तीफा ले लीजिए, नहीं तो बेइज्जती होगी। चंद्रशेखर ने कहा कि ऐसा कैसे होगा? बिना पूछे वे ऐसा नहीं कर सकते। अगर आशंका है तो मधु को त्यागपत्र दे देना। सुषमा स्वराज के जाने के थोड़ी देर बाद ही एजेंसियों से खबर आई कि हरियाणा के मुख्यमंत्री ने अपने एक मंत्री को फरीदाबाद के मर्चेंट चैंबर ऑफ काॅमर्स की सभा से बर्खास्त कर दिया। 

चंद्रशेखर देवीलाल के इस अभद्र व्यवहार से हैरान थे। उन्होंने देवीलाल से बात की और कहा कि खबर आई है आपने सुषमा स्वराज को बर्खास्त कर दिया। जिस पर देवीलाल ने जवाब दिया कि वह किसी काम की नहीं हैं। कोई काम नहीं करतीं, परेशानी पैदा करती हैं। जवाब में चंद्रशेखर बोले आप उन्हें वापस लीजिए। लेकिन देवीलाल नहीं माने। चंद्रशेखर ने कहा चौधरी साहब, अगर आपने सुषमा स्वराज को वापस नहीं लिया तो आप चीफ मिनिस्टर नहीं रह सकते। मुझे पार्टी अध्यक्ष होने के नाते जरूरत पड़ने पर इस बात का अधिकार है कि आपको पार्टी से निकाल दूं। नोटिस पीरियड 15 दिन का होगा। उस दौरान मैं नए नेता के चुनाव का ऑर्डर कर दूंगा और आपका ही कोई आदमी आपके खिलाफ खड़ा हो जाएगा। चौधरी देवीलाल इस तरह के संवाद के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे वे दिल्ली की ओर दौरे और चौधरी चरण सिंह से मुलाकात की। चौधरी चरण सिंह ने देवीलाल को बर्खास्त करने की धमकी के बारे में चंद्रशेखर से पूछा। जवाब में चंद्रशेखर ने सारा माजरा चौधरी चरण सिंह को बताया। सब सुनकर चौधरी चरण सिंह ने देवीलाल को फटकार लगाई। बाद में सुषमा मंत्रिमंडल में बनीं रहीं। 1990 में राज्यसभा की सदस्य बनीं। 1996 से दक्षिणी दिल्ली से लोकसभा का चुनाव जीता। अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार में सूचना प्रसारण मंत्री बनीं। दिल्ली पहली महिला मुख्यमंत्री रहीं। 

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 बेलल्लारी की लड़ाई हार गई लेकिन युद्ध जीत लिया 

1999 की अटल बिहारी वाजपेयी की 13 महीने की सरकार गिर चुकी थी और 13वें लोकसभा चुनाव की तैयारियां चल रही थी। कांग्रेस में सोनिया युग का प्रारंभ हो चुका था। कांग्रेस के भीतर विद्रोह फिर शरद पवार, पीए संगमा, तारिक अनवर ने विदेशी मूल का मुद्दा बनाकर पार्टी छोड़ नई पार्टी बना ली। ये पहली दफा था कि सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा इतनी प्रखरता से उठा। 1998 का दिल्ली विधानसभा का चुनाव हारकर सुषमा स्वराज राष्ट्रीय राजनीति में वापस लौटी थीं। जब यह खबर आई कि सुषमा कर्नाटक की बेल्लारी सीट से चुनाव लड़ेंगी। सभी दंग रह गए क्योंकि यहीं से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी चुनाव लड़ने जा रही थी। देशी बेटी बनाम विदेशी बहू के नाम से इस चुनाव को बुलाया जा रहा था। सुषमा ने भी सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा खूब उठाया। सुषमा स्वराज ने सोनिया गांधी के खिलाफ जमकर चुनाव प्रचार किया। यहां तक की कन्नड़ में भाषण तक देना सीख लिया था। सुषमा स्वराज ने स्थानीय मतदाताओं से सहज संवाद के लिए कन्नड़ सीखनी शुरू की और करीब एक महीने के भीतर ही वह कन्नड़ सीखने में कामयाब हुईं। उनके कन्नड़ में दिए गए भाषण की कई क्लिप आज भी इंटरनेट पर मिल जाएंगे। सुषमा स्वराज को इस वजह से तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से शाबाशी भी खूब मिली। अटल ने कहा था कन्नड़ भाषा पर उनका अधिकार देख कर मैं आश्चर्यचकित रह गया। मुझे डर है कर्नाटकवासी उन्हें अपने यहां ही न रख लें और दिल्ली जाने से मना करें। हांलाकि सुषमा 56 हजार वोटों से हार गई। मगर उनका कद बढ़ गया। वो अटल सरकार में मंत्री बन गईं। बीजेपी की पहली महला मंत्री। समय बीता 2004 के चुनाव में बीजेपी का इंडिया शाइनिंग का नारा फ्लाॅप साबित हुआ। कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की और लगा कि सोनिया गांधी का प्रधानमंत्री बनना तय है। एक बार फिर सुषमा ने ही कमान संभालते हुए घोषणा की कि अगर सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनती हैं तो वो अपने पद से त्यागपत्र दे देंगी। अपना सिर मुंडवा कर पूरा जीवन एक भिक्षुक की तरह बिताएंगी। किसी नेता ने इससे पहले शायद ही ऐसी घोषणा कि होगी। हांलाकि सुषमा स्वराज को ऐसा कुछ नहीं करना पड़ा क्योंकि कांग्रेस ने सोनिया की जगह डाॅ. मनमोहन सिंह को आगे कर दिया। सितंबर 2013 में भी सुषमा ने सोनिया के पीएम बनने के सवाल पर 2004 की तरह ही बात की थी। एक कार्यक्रम में सुषमा ने कहा ”मैंने हमेशा कहा है कि सोनिया गांधी हमारे देश में इंदिरा गांधी की पुत्र वधु और राजीव गांधी की पत्नी के रूप में आई थीं और इस प्रकार वो हमारे प्यार और स्नेह की हकदार हैं। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में वो हमारे सम्मान की भी हकदार हैं। लेकिन वो अगर प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं तो मैं नहीं कहूंगी। देश लंबे समय तक विदेशी शासन के अधीन रहा है और आजादी के लिए कई लोगों ने अपने प्राण गंवाए। अगर 60 साल की आजादी के बाद हम किसी विदेशी को शीर्ष पर बिठाते हैं तो इसका मतलब यह होगा कि 100 कोरड़ लोग असक्षम हैं। इससे लोगों की संवेदनशीलता प्रभावित होगी। यही कारण था कि मैंने 1999 में बेल्लारी से चुनाव लड़ा और ये मेरे लिए एक मिशन था। बेल्लारी में मैं लड़ाई जरूर हार गई लेकिन युद्ध जीत लिया था। 

मदद की मदर इंडिया 

सुषमा स्वराज एक ऐसी नेता थी जिनमें लोग दीदी या मां का रुप देखते थे। सुषमा स्वराज ने हर पुकार पर मां की तरह मदद की इसलिए लोग उन्हें मदर इंडिया भी कहने लगे थे। दुनिया के किसी भी कोने से मदद की आवाज आई तो सुषमा ने बिना देर के मदद की। हामिद अंसारी को पाकिस्तान की जेल से वापस लाने के लिए सुषमा स्वराज ने दिन रात एक कर दी। प्यार के चक्र में हामिद सात साल पहले पाकिस्तान पहुंच गया था। जब सुषमा विदेश मंत्री थी तब उन्होंने सच्चाई से पाकिस्तान की सरकार को रूबरू करवाया और हामिद को घर नसीब हुआ। ये कोई अकेला मामला नहीं था जब कि सुषमा की मदद से एक परिवार की खुशियां लौटीं। 25 मई 2017 की वह तस्वीर को भला कौन भूल सकता है, जब भारत मां को प्रणाम करती उष्मा नजर आईं थी। शादी के झांसे में फंसी दिल्ली की रहने वाली उष्मा को सुषमा की वजह से वतन की मिट्टी नसीब हुई। 

2010 में दिल्ली के सीमापुरी में रहने वाला सोनू जब छह साल का था तब किसी ने उसे दिल्ली से अगुवा कर लिया था। सोनू को अगवा करके बदमाश बांग्लादेश ले गए। साल 2016 में घरवालों ने सुषमा को इसकी जानकारी दी तो सुषमा ने दिन रात एक करके सोनू को परिवार तक पहुंचा दिया। सुषमा स्वराज राजनीति की सुषमा थीं स्वराज उनके दिल में बसता था। वो जानती थी कि जनता से जुड़ते कैसे हैं और कैसे बनाते हैं घर उनके दिलों में। जब विदेश मंत्री रहते ललित मोदी की मदद का सवाल उठा तो सबको लगा कि सुषमा चुप्पी में अपने बचाव की तलाश चुनेंगी। लेकिन उन्होंने अपने आत्मा की आवाज को जनता की अदालत में पेश कर दिया था। सुषमा ने कहा कि उन्होंने मानवीय आधार पर ललित मोदी नहीं बल्कि उनकी कैंसर से पीड़ित पत्नी की मदद की थी। 

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चार दशक के राजनीतिक करियर में तीन बार विधायक और सात बार सांसद रहीं। 15वीं लोकसभा में नेताप्रतिपक्ष रहीं। संसदीय कार्य मंत्री, केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री और विदेश मंत्रालय का जिम्मा संभाला। नवंबर 2016 में किडनी ट्रांसप्लांट हुआ। नवंबर 2018 में ऐलान किया कि 2019 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगी। जिसके बाद 6 अगस्त 2019 को सुषमा स्वराज का कार्डिक अरेस्ट से निधन हो गया। 

राजनीति में विचारों के विरोध को दुश्मनी मान लेने की चल पड़ी रवायत के दौर में सुषमा स्वराज की इसे असल कमाई ही कहेंगे कि उनके जाने की घड़ी में साथ वाले रो पड़े। खिलाफ वाले रो पड़े और चुन-चुन कर हमलों के हिसाब वाले भी रो पड़े। यूं ही नहीं कोई बन जाता है सुषमा स्वराज। अंतरविरोधों की भट्टी में जलाना पड़ता है खुद को, तपानी पड़ती है अपनी हड्डियां। सुषमा स्वराज का जाना राजनीति की उस उष्मा का जाना था जिसकी गर्माहट से बनती रही है जम्हूरियत की मीनांरें। – अभिनय आकाश



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